पिथौरागढ़ जिला उत्तराखण्ड 2021 ।

पिथौरागढ़ शहर। पिथौरागढ़ जिला उत्तराखण्ड। पिथौरागढ़ की जनसंख्या। पिथौरागढ़ का नक्शा। पिथौरागढ़ की स्थापना कब हुई। पिथौरागढ़ जिला कब बना।

पिथौरागढ़ जिला उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में स्थित है, इस खूबसूरत जनपद की स्थापना 24 फरवरी 1960 को अल्मोड़ा जनपद के कुछ हिस्से (कापती खंड) को अलग करके की गयी थी। यह एक सीमांत जनपद है, जिसकी सीमाएं नेपाल देश के साथ तिब्बत से भी लगती है। इसका जनपद मुख्यालय पिथौरागढ़ है । समुद्र तल से इसकी ऊंचाई 1636 मीटर की पास – पास है।

पिथौरागढ़ सौर घाटी में कटोरे की आकृति में बसा हुआ एक सुंदर शहर है जो बहुत ही सुंदर लगता है इसके आसपास का वातावरण साफ ,स्वच्छ एवं आकर्षक है जिसके कारण यहां पर वर्ष भर भर जिसके कारण यहां पर वर्ष भर भर कारण यहां पर वर्ष भर भर पर्यटकों की भीड़ लगी रहती है पर्यटकों के लिए पिथौरागढ़ बेहद खास स्थल है इसको धरती का स्वर्ग एवं छोटा कश्मीर के नाम से भी जाना जाता है।

पिथौरागढ़ में एक बहुत ही पुराना किला (दुर्ग) है जिसे लोकल भाषा में सिमलगगढ़ कहा जाता है। एक मान्यता के अनुसार यह दुर्ग गोरखौं के द्वारा बनाया गया था देश आजादी के पूर्व अंग्रेज के ऑफिसर लोग इस दुर्ग में रहना पसंद करते थे और वे लोग इस दुर्ग को लंदन पोर्ट के नाम से भी पुकारते थे। नगर के समीप चंडाक देवी का भव्य मंदिर है जो बहुत ही सुंदर एवं आकर्षक है यहां से आप झुलाघाट होते हुए नेपाल की सीमा में भी प्रवेश कर सकते हैं

पिथौरागढ़ से चीन जाने के लिए भी कहीं दर्रे हैं हैं। यह जिला उत्तराखंड का सबसे पूर्वी जिला है इसके साथ यह प्राकृतिक सुंदरता से भी भरपूर है यहां पर ऊंचे ऊंचे बर्फीले पहाड़, दर्रे, घाटिया ,सुंदर घास के मैदान ऊंचे ऊंचे झरने हिमालय से निकलने वाली जीवनदायिनी नदियां, ग्लेशियर भरपूर मात्रा में है जो पिथौरागढ़ की सुंदरता में चार चांद लगाते हैं।

पिथौरागढ़ जिला उत्तराखण्ड एक नजर में।

राज्य उत्तराखंड
मंडल कुमाऊं
जिले के स्थापना24 फरवरी 1960
कुल क्षेत्रफल 7090 sq km
कुल जनसँख्या 483440 (2011 की जनगणना अनुसार)
साक्षरता 82.25 % (2011 की जनगणना अनुसार)
जिले की आधिकारिक वेबसाइट https://pithoragarh.nic.in/hi/
कुल विकास खंड 8

पिथौरागढ़ के प्रमुख दर्शनीय स्थल

जिला उत्तराखण्ड

मुनस्यारी

एक मान्यता के अनुसार यह स्थल पौराणिक समय में तपस्वीयों की भूमि कहा जाता था। यह तप साधु संत एवं मुनि लोग करते थे कालांतर में यह नाम परिवर्तित होकर मुनि का सेरा यानी मुनस्यारी हो गया। इसको जोहार क्षेत्र का प्रवेश द्वार भी कहा जाता है पिथौरागढ़ से इसकी दूरी मात्र 165 किलोमीटर के आसपास है। यहां से हिमालय की ऊंची ऊंची बर्फीली चोटियों के बर्फीली चोटियों के एवं नैनीताल जनपद के ऊंचे ऊंचे पर्वतों के साक्षात दर्शन होते हैं।

मुनस्यारी उत्तराखंड

यह क्षेत्र ऊनी वस्त्रों जैसे शाल, दन, कालीन, पंखी, पशमीना दूसाले एवं पहाड़ी जड़ी बूटियों के लिए अत्यधिक प्रसिद्ध है। मुनस्यारी में एक एक सुंदर वाटरफॉल एवं झील भी भी भी है, जहां पर गर्मी के मौसम में काफी भीड़ रहती है इसके आसपास का वातावरण अत्यंत मनमोहक एवं बेहद आकर्षक है यहां से रालम ,नामिक, मिलम इत्यादि ग्लेशियरों के लिए भी रास्ता जाता है, यहां पर पर्यटकों को सस्ते दरों पर रहने एवं खाने की उचित सुविधा उपलब्ध है।

ओम पर्वत

इस पर्वत को हिंदू धर्म की आस्था के प्रतीक के रूप में भी माना जाता है इसे आदि कैलाश या छोटा कैलाश भी कहा जाता है। ओम पर्वत तिब्बत की सीमा पर स्थित है जिसके कारण इस स्थल का भारत के लिहाज से सामरिक महत्व भी अत्यधिक है। यहां के लिए गुंजी से 14 किलोमीटर पैदल ट्रैक चलना पड़ता है पड़ता है जहां वर्षभर शिव शंकर को मानने वाले लोग जाते हैं।

यहां पहुंचने पर मनुष्य को अलौकिक शांति की अनुभूति होती है यहां पर वर्ष भर बहुत ठंड रहती है भर बहुत ठंड रहती है और मौसम खराब होने पर तुरंत हिमपात शुरू हो जाता है। एकांत क्षेत्र में स्थित शिव का यह.स्थल बहुत ही रमणीक है इसके पास में ही पास में ही इसके पास में ही पास में ही एक पार्वती ताल है जो बहुत ही सुंदर एवं आकर्षक है।

मिलम ग्लेशियर

यह कुमाऊं का सबसे बड़ा ग्लेशियर है यह पिथौरागढ़ से लगभग 208 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां जाना प्रतिबंधित है जो भी व्यक्ति मिलम ग्लेशियर जाना चाहता है उसे सर्वप्रथम वहां के (डीएम) या (एसडीएम) से पास बनवाना पड़ता है। तभी इस ग्लेशियर के लिए प्रवेश मिलता है।

यह एक उच्च हिमालई क्षेत्र होने के कारण इसके रास्ते पर भोजपत्र के घने जंगल मिलते हैं जिससे यह ट्रैक और भी आकर्षक लगता है इसके साथ साथ हिमालय की दुर्लभ जड़ी बूटियों का यहां पर विशाल भंडार है और साथ ही इस रास्ते पर कस्तूरी मृग भी आपको आपको देखने को मिलते हैं। पर्यटकों के लिए यह स्थल स्वर्ग है यहां जाने पर मनुष्य मंत्रमुग्ध हो जाता है, गर्मी के मौसम में यहां का मौसम बहुत ही खूबसूरत होता है जिसके कारण बहुत से देश-विदेश के पर्यटक यहां पर घूमने के लिए आते हैं इसके बाद किंगरी विंगरी दर्रा पड़ता है।

नारायण आश्रम

पिथौरागढ़ से इस आश्रम की दूरी 129 किलोमीटर के आसपास है ।यह धारचूला तहसील में पड़ता है आश्रम बहुत ही आकर्षक एवं सुंदर है आश्रम का निर्माण नारायण स्वामी द्वारा सन 1936 में कराया गया था ।आश्रम अध्यात्मिक का बहुत बड़ा केंद्र है जहां पर बहुत से साधु संत संत हर समय मौजूद रहते हैं इसके साथ-साथ यह सामाजिक शिक्षा का भी बहुत बड़ा केंद्र है।

आश्रम अब धीरे-धीरे पर्यटन हब के रूप में में विकसित हो रहा है जिसके कारण यहां वर्ष भर बहुत से पर्यटक घूमने के लिए आते हैं इस आश्रम की समुद्र तल से ऊंचाई 2734 मीटर है जिस कारण यहां वर्ष भर भर ठंडा मौसम रहता है यहां सर्दी के मौसम में खूब बर्फबारी होती है जिसके कारण यह सर्दियों में बंद रहता है लोकल भाषा में इस आश्रम को बंगवा या चौदास भी कहा जाता है आश्रम के आसपास का नजारा बेहद खूबसूरत है थोड़ी ही दूरी पर धौलीगंगा व काली गंगा का संगम तवाघाट नामक स्थल पर होता है।

गंगोलीहाट

यह स्थल मां काली शक्तिपीठ के रूप में प्रसिद्ध है यहां शंकराचार्य द्वारा ही इस पीठ की स्थापना की गई थी। पिथौरागढ़ में यह स्थल हिंदू धर्म की आस्था का बहुत बड़ा केंद्र है यहां वर्ष भर मां काली के भक्त मां काली के भक्त दर्शन के लिए आते रहते हैं यहां से कुछ ही दूरी पर रावल गांव है जहां जानवी नौला गुप्त गंगा का पुरातात्विक महत्व अत्यधिक है।

हाटकांलिका मंदिर

गंगोलीहाट के पास ही या प्रसिद्ध मंदिर स्थित है इस मंदिर की पुरानी बहुत सी मान्यताएं हैं यह देवी रणभूमि मैं गए जवानों की रक्षक मानी जाती है ।यह मंदिर महिषासुर मर्दिनी सिद्ध पीठ के रूप में भी बहुत प्रसिद्ध है। मंदिर विशेषकर अपने रहस्यों के कारण भी काफी चर्चित है मंदिर परिसर में एक कुंड है इसके विषय में कहा जाता है कि यह कुंड कभी भी नहीं भरता यहां पर हजारों बकरों की बलि दी जाती है।

जिसके बाद भी यह कुंड हमेशा खाली रहता है कहा जाता है कि मंदिर परिसर में रात को स्वयं मां महिषासुर मर्दिनी शयन करने के लिए आती है यहां पर हर रोज मंदिर में बिस्तर लगाना पड़ता है और रात को ताला भी लगा दिया जाता है सुबह ताला खोलने पर बिस्तर पर किसी के पद चिन्ह चिन्ह साफ दिखाई देते हैं।

पाताल भुवनेश्वर

यह स्थल गंगोलीहाट के पास ही स्थित है यह मंदिर अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है मंदिर गुफा के अंदर स्थित है। जो पूर्ण रूप से प्राकृतिक रूप से से बना हुआ है, पत्थरों को बजाने पर धातु जैसी ध्वनि उत्पन्न उत्पन्न उत्पन्न होती है इस गुफा में सूर्य, विष्णु ,उमा ,महेश्वर ,महिषासुर मर्दिनी आदि देवी-देवताओं की कई प्राचीन मूर्तियां हैं ।इस गुफा के कहीं द्वार है जिसमें कुछ द्वार विशेष है जिनमें जिनमें नृसिंह, शेषनाग रानी ,धर्म, मोक्ष द्वार मुख्य है।

एक मान्यता के अनुसार यहां पर 33 करोड़ देवी देवता निवास करते हैं इस गुफा के समीप पातालगंगा नदी है जिससे नदी है जिससे गुफा का आकर्षण और भी अत्यधिक बढ़ जाता है इस गुफा के आसपास का वातावरण बहुत ही मनमोहक एवं सुंदर है यह गुफा भी हिंदू धर्म की हिंदू धर्म की भी हिंदू धर्म की हिंदू धर्म की आस्था का बहुत बड़ा प्रतीक है जिसके कारण कारण है जिसके कारण यहां पर बहुत से भक्त दर्शन करने के लिए आते हैं और पुण्य अर्जित करते हैं ऐसा माना जाता है कि जो भी भक्त सच्चे मन से यहां पर ईश्वर से कुछ मांगता है उसको ईश्वर अवश्य पूरी करते हैं।

रामेश्वर

जनपद मुख्यालय से इस स्थल की दूरी मात्र 35 किलोमीटर है रामेश्वर में रामगंगा और सरयू नदी का संगम होता है इसी संगम के तट पर प्रसिद्ध शिव मंदिर है यहां पर प्रत्येक वर्ष मकर संक्रांति के दिन विशाल मेले का आयोजन होता है जिसमें आसपास के क्षेत्र के बहुत से लोग प्रतिभाग करते हैं। रामेश्वर के आसपास का नजारा बहुत ही सुंदर है।

अस्कोट

पिथौरागढ़ से इसकी दूरी मात्र 54 किलोमीटर है यह स्थल पौराणिक समय में में कत्यूरी राजाओं की राजधानी के रूप में प्रसिद्ध था। आज भी यहां पर राजाओं के किले मिलते हैं इसके अलावा यह क्षेत्र जंगली जानवरों के लिए भी विशेष प्रसिद्ध है यहां पर आपको हिमालय क्षेत्र के सभी प्रकार के जंगली जानवर देखने को मिल जाते हैं इसके साथ उत्तराखंड का राज्य पशु कस्तूरी मृग का यहां बहुत बड़ा वन्य जीव विहार है इसके आसपास घने जंगल एवं सुंदर झाड़ियां है।

धारचूला

काली नदी के तट पर भारत और नेपाल देश की सीमा पर धारचूला स्थित है पिथौरागढ़ से इसकी दूरी मात्र 96 किलोमीटर के आसपास है धारचूला में आपको अधिकतर नेपाली लोग देखने को मिलेंगे जिन का मुख्य व्यवसाय नेपाली लोग देखने को मिलेंगे जिन का मुख्य व्यवसाय देखने को मिलेंगे जिन का मुख्य व्यवसाय हाथों से निर्मित वस्तुएं है जिनमें कालीन ,लोई इत्यादि प्रमुख हैं जो नेपाल से आयात की जाती है।

जिला उत्तराखण्ड 2

धारचूला से कैलाश मानसरोवर छोटा कैलाश तथा नारायण आश्रम के लिए भी रास्ता जाता है इसके आसपास का वातावरण बहुत ही सुंदर है सामने नेपाल देश और बीच में काली में काली बीच में काली काली नदी का विहंगम दृश्य धारचूला के सुंदरता में चार चांद लगाते हैं।

कैलाश मानसरोवर यात्रा

विश्व की सबसे पवित्र यात्रा में से एक यात्रा है यात्रा है कैलाश मानसरोवर जो हिंदू धर्म के प्रत्येक व्यक्ति करना चाहता है। इसका रास्ता कुमाऊं से होकर होकर जाता है यह यात्रा कुमाऊँ मंडल विकास निगम द्वारा संचालित होती है जिसका विवरण इस प्रकार से है यात्रा नई दिल्ली से शुरू होकर उत्तर प्रदेश होते हुए जनपद उधम सिंह नगर में प्रवेश करती है है सिंह नगर में प्रवेश करती है है सिंह नगर में प्रवेश करती है।

पिथौरागढ़ जिला उत्तराखण्ड

उधम सिंह नगर में प्रवेश करती है है होते हुए जनपद उधम सिंह नगर में प्रवेश करती है है सिंह नगर में प्रवेश करती है है सिंह नगर में प्रवेश करती है है उधम सिंह नगर में प्रवेश करती है है नगर में प्रवेश करती है है उसके बाद नैनीताल होते हुए अल्मोड़ा में प्रवेश करती है। तत्पश्चात डोडीहाट (पिथौरागढ़ )में प्रवेश करती हैं यहां से यह यात्रा धारचूला से तवाघाट होते हुए सिरखा जाती है। सिरखा से गलागढ़ ,गुंजी, बुल्ली ,कालापानी ,नाभिडांग, तकलाकोट में प्रवेश करती है।

इसके बाद आप कैलाश मानसरोवर (चीन) पहुंचते हैं ।इस यात्रा के लिए सर्वप्रथम रजिस्ट्रेशन करना पड़ता है यहां का मौसम हर समय बहुत ठंडा रहता है जिससे यात्रियों को सलाह दी जाती है कि यात्रा के दौरान गर्म कपड़े भरपूर मात्रा में अपने साथ रखें और बीमार व कमजोर व्यक्ति इस यात्रा से परहेज करें क्योंकि यहां पर बहुत बड़ा पैदल ट्रैक के साथ ऑक्सीजन लेवल बहुत कम रहता है।

थल केदार

जनपद मुख्यालय से इस स्थल की दूरी मात्र 16 किलोमीटर के आसपास है यह स्थल नैसर्गिक सौंदर्य एवं प्राकृतिक सुषमा से सजा संवरा बहुत ही सुंदर एक पहाड़ी पर स्थित है। यहां से आसपास के पूरे क्षेत्र का सुंदर नजारा दिखाई देता है शिवरात्रि के समय यहां पर विशाल मेले का आयोजन होता है जिसमें बहुत से श्रद्धालु प्रतिभाग करते हैं इन्हें केदार जयू के नाम से भी जाना जाता है जो पूरे उत्तराखंड में बहुत ही प्रसिद्ध है।

छिपला केदार

धारचूला पिथौरागढ़ के समान ही इस स्थल का धार्मिक महत्व है यह स्थल बहुत ऊंचाई पर स्थित है समुद्र तल से इस स्थल की ऊंचाई 15000 फुट के आसपास हैं यहां आसपास के लोग केदारनाथ की पूजा करने के लिए यहां के लोग जात के रूप में छिपला केदार की यात्रा करते हैं।

बेरीनाग

यह स्थल चाय बागान के रूप में प्रसिद्ध है जनपद मुख्यालय से इसकी दूरी 102 किलोमीटर के आसपास है। बेरीनाग से हिमालय श्रृंखला केनसाक्षात दर्शन कर सकते हैं यहां पर हरे हरे चाय के बागों चाय के बागों के साथ जब हिमालय की सफेद चोटियों के दर्शन होते हैं तो मन को अलौकिक शांति का अनुभव होता है यहां पर भी वर्षभर बहुत से पर्यटक घूमने के लिए आते हैं और इस अद्भुत एवं सुंदर स्थल का आनंद लेते हैं।

गरुण वाटर फॉल

प्रकृति का यह वरदान बेरीनाग से मात्र 4 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है यहां पर एक सुंदर वाटरफॉल है जहां पर गर्मी के मौसम में खूब पर्यटक आते हैं यहां के आसपास का नजारा बेहद आकर्षक एवं सुंदर है झरने के आसपास सुंदर-सुंदर वृक्ष एवं वनस्पतियों का जंगल है जिससे यह प्रपात और भी आकर्षक लगता है।

चकोड़ी

यह स्थल पिथौरागढ़ से 112 किलोमीटर दूर है यहां पर प्रकृति का अद्भुत नजारा आपको देखने के लिए मिलता है यहां बहुत से दर्शनीय स्थल है जिसमें कोटमान्य में कस्तूरी मृग फॉर्म एवं फॉर्म एवं धर्म घर में हिम दर्शन कुटीर मुख्य है यह पूरा क्षेत्र चाय बागानों एवं फल पट्टी के रूप में भी पूरे उत्तराखंड में बहुत प्रसिद्ध है यहां पर भी प्रकृति की इस अद्भुत नजारे अद्भुत नजारे इस अद्भुत नजारे को देखने के लिए देश-विदेश के बहुत से पर्यटक पूरे वर्ष घूमने के लिए आते हैं।

GOOGLE MAP PITHORAGARH UTTARAKHAND 2021

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