चंपावत जनपद उत्तराखंड। Tourist Places in Champawat 2021

कुमाऊं मंडल के खूबसूरत जनपदों में एक है, चंपावत जो समुद्र तल से लगभग 5000 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। इस ऐतिहासिक नगर की स्थापना 953 ईसवी में प्रथम चंद्रवंशी राजा सोमचंद्र द्वारा की गई थी। चंपावत को कुमाऊं का प्रथम नगर माना जाता है क्योंकि पौराणिक समय में सन 953 ईसवी से 1563 ईस्वी तक यह नगर चंद्रवंशी राजा और संपूर्ण कुमाऊं क्षेत्र की राजधानी रही है।

मुनस्यारी के पर्यटन स्थल।

चंद राजाओं ने 1563 ईस्वी में राजधानी को चंपावत से हटाकर अल्मोड़ा स्थानांतरित कर दी थी। चंपावत में राजबुंगा ,गोलचोड़ किला ,नौढुगिया भवन सभी ऐतिहासिक स्थल है। राज्य बनने से पूर्व 15 सितंबर 1997 को इसे एक जनपद बना दिया गया था। हिमालय सौंदर्य की दृष्टि से यह उत्तराखंड के सुंदरतम भू -भागों में से एक है ।यहां की जलवायु समशीतोष्ण है ।

चंपावत भगवान विष्णु के कूर्म अवतार की शीला कानदेव तथा वानर राज बाली द्वारा स्थापित बालेश्वर मंदिर कुमाऊं के लोक देवता देवता गोरिल के आश्रम गौरिलचौड़ एवं स्कंद पुराण के मानस खंड में वर्णित बौद्ध तीर्थ चंद राजवंश की राजधानी के अवशेष तथा कैलाश मानसरोवर के पारंपरिक मार्ग होने के कारण पारंपरिक मार्ग होने के कारण सदैव से चर्चित रहा है।

चंपावत जनपद का प्राचीन नाम (कुमु )था, एवं इसका मूल नाम चंपावती था बद्री प्रसाद पांडे के कुमाऊं पांडे के कुमाऊं का इतिहास के अनुसार चंपावत के पूर्व के ऊंचे पर्वत पर कांतेश्वर महादेव है इसे कुर्मा पद या कानदेव भी कहते हैं। यहीं पर पहाड़ के सामने देवदार के सुंदर जंगल है जहां पर मल्लाणेश्वर महादेव है इस जनपद के पश्चिम की तरफ हिंगला देवी तथा नृसिंह देवता का मंदिर है जो एक सिद्ध पीठ के रूप में विख्यात है।

चंपावत के प्रमुख दर्शनीय स्थल

शिल्प कला की दृष्टि से यह चंपावत का सबसे उत्कृष्ट मंदिर है यह मंदिर मंदिर नगर के बीचो बीच स्थित है। इस मंदिर में शिव भगवान की प्रतिमा के अलावा अन्य देवी देवताओं की प्रतिमा भी स्थापित है इस मंदिर का निर्माण 1272 में चंद्र राजाओं ने कराया था यहां पर वर्ष भर लोग मंदिर में दर्शन करने के लिए आते हैं मंदिर के आसपास का नजारा बेहद खूबसूरत है ।

कांतेश्वर महादेव

नागनाथ

एक ऊंचे पर्वत पर्वत शिखर पर चंपावत के पूर्व दिशा में यह प्रसिद्ध मंदिर स्थित है इसे कानदेव के नाम से भी जाना जाता है ।मंदिर के आसपास का नजारा बहुत ही खूबसूरत है बरसात के मौसम में यहां आसपास खूब हरियाली रहती है जिसके कारण यह मंदिर और भी आकर्षक लगता है।

तहसील भवन के समीप यह प्राचीन मंदिर स्थित है इस मंदिर में भी शिल्प कला की अनूठी छाप आपको देखने को मिलेगी नागनाथ महाराज की यहां पर यहां पर पौराणिक समय से ही बहुत मान्यता है जो वर्तमान समय तक चली आ रही है एक मान्यता के मान्यता के अनुसार जो भी भक्त सच्चे मन से नागनाथ महाराज की भक्ति करता है उसको महाराज सदैव सुखी रखते हैं इसके साथ-साथ मंदिर परिसर के आसपास का वातावरण अत्यंत मनमोहक एवं सुंदर है।

नौ ढुगांघर (नौ पत्थर का मकान)

यह मकान भी शहर के समीप ही स्थित है शहर से मात्र इसकी शहर से मात्र इसकी दूरी लगभग 2 किलोमीटर के आसपास है चंपावत पिथौरागढ़ मोटर मार्ग के पास एक गांव पड़ता है मादंली तली यहीं पर यह 9 पत्थर का मकान स्थित है।

इस मकान की विशेषता यह है कि इसको किसी भी कोने से गिनने पर पत्थरों की संख्या आपको 9 आएगी यह घर अब धीरे-धीरे पर्यटन हब के रूप में विकसित हो रहा है यहां पर वर्ष भर देश विदेश के बहुत से पर्यटक आते हैं और इस खूबसूरत स्थल का आनंद लेते हैं इसके आसपास का वातावरण हर मौसम में बहुत ही खूबसूरत रहता है।

घटोत्कच का मंदिर

पांच पांडवों में भीम सबसे अधिक बलशाली शरीर वाले थे जिन को देखते ही विरोधी खेमे में देखते ही विरोधी खेमे में विरोधी खेमे में हलचल मच जाती थी। इन्हीं भीम के पुत्र का नाम था घटोत्कच इन्हीं के नाम से यहां मंदिर बनाया गया है मंदिर बहुत ही खूबसूरत एवं भव्य है यहां पर घटोत्कच की विशाल प्रतिमा भी है जो इस मंदिर के आकर्षण का मुख्य केंद्र है यहां पर मंदिर होने से इस बात की पुष्टि हो जाती है कि महाभारत काल में यहां पर पांडव जरूर आए थे।

एक हथिया नौला

शहर से मात्र 4 किलोमीटर की दूरी पर यह ऐतिहासिक धरोहर स्थित है। यहां से अद्वैत आश्रम के लिए पैदल मार्ग जाता है इस स्थल के विषय में कहावत है कि जब चंद्र राजाओं ने श्री जगन्नाथ नामक मिस्त्री से से बालेश्वर का खूबसूरत मंदिर बनवाया था तो राजा ने सोचा कि ऐसा खूबसूरत सोचा कि ऐसा खूबसूरत मंदिर पूरी दुनिया में अब दुबारा न बने इसलिए मिस्त्री का दाहिना हाथ कटवा दिया था।

मिस्त्री ने भी भी चंद राजाओं के घमंड को तोड़ने के घमंड को तोड़ने के लिए अपनी बेटी कुमारी कस्तूरी की मदद से बालेश्वर मंदिर से भी ज्यादा भव्य एवं सुंदर कलात्मक इस ऐतिहासिक नौला( बावली) का निर्माण किया था ।यह स्थल कौशल कलात्मक दृष्टि से एक अद्भुत नमूना है।

बाणासुर का किला

जिला मुख्यालय से मात्र 16 किलोमीटर एवं लोहाघाट से मात्र 4 किलोमीटर की दूरी पर एक पर्वत पर बाणासुर का किला स्थित है इस किले के अंदर के अंदर जाने के लिए सीढ़ियां बनी हुई है यह किला भी भी शिल्प कला का अनूठा उदाहरण पेश करता है बाणासुर को शिव का का का अनन्य भक्त माना जाता है किले के आसपास बहुत सुंदर-सुंदर वृक्ष एवं पत्थर है पत्थर है वृक्ष एवं पत्थर है पत्थर है। यहां से आसपास के क्षेत्र का मनमोहक दृश्य दिखाई देता है।

लोहाघाट

प्रकृति की सुंदरता से भरपूर यह रमणिक स्थल चंपावत से 14 किलोमीटर एवं पिथौरागढ़ से 60 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है पर्यटकों के लिए यह स्थल स्वर्ग से कम नहीं है यहां का वातावरण शांत एवं आकर्षक है लोहाघाट के आसपास लोहाघाट के आसपास देवदार के वृक्षों का सुंदर जंगल है इसके साथ साथ यहां पर मखमली घास के छोटे-छोटे बुग्याल है। और कई प्रकार के फूल फूल एवं जड़ी बूटियों के यहां पर विशाल भंडार है आजादी से पूर्व व्यवस्था आजादी से पूर्व व्यवस्था अंग्रेजों को बड़ा प्रिय था।

मायावती आश्रम

हरे-भरे जंगलों के बीच प्रकृति से सजा सांवरा सांवरा यह स्थल लोहाघाट से मात्र 9 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है यह वही स्थल है जहां पर स्वामी विवेकानंद को आध्यात्मिक शांति प्राप्त हुई थी। इसके बाद यहां पर स्वामी जी द्वारा 1901 में रामकृष्ण शांति शांति शांति मठ की स्थापना की गई थी इससे पहले यहां पर अद्वैत आश्रम था यहां पर भी वर्षभर बहुत से पर्यटक घूमने के लिए आते हैं और इस खूबसूरत जगह का आनंद उठाते हैं।

देवीधुरा

लोहाघाट से 58 किलोमीटर की दूरी पर एवं समुद्र तल से 2500मीटर की ऊंचाई पर कुमाऊं क्षेत्र का यह प्रसिद्ध स्थल स्थित है ।यहां पर रक्षाबंधन के अवसर पर (अषाढ़ी कौतिक )मनाया जाता है, जिसे बग्वाल मेले के नाम से जाना जाता है। यह मेला पूरे विश्व में प्रसिद्ध है इस मेले में होने वाले पाषाण युद्ध पाषाण युद्ध को देखने के लिए देश-विदेश से लोग आते हैं प्रसिद्ध शिकारी जिम कार्बेट ने ने अपनी पुस्तक मेन हीटर ऑफ कुमाऊं कुमाऊं ऑफ कुमाऊं कुमाऊं हीटर ऑफ कुमाऊं कुमाऊं ऑफ कुमाऊं मैं इस मेले का वर्णन किया है।

प्रचलित कथाओं के अनुसार शुरुआत में यहां चमियाल खाम, लमगड़िया खाम, गहड़वाल खाम, एवं बालिक खाम, में से किसी एक खाम के एक व्यक्ति को प्रतिवर्ष बलि देने की परंपरा रही है। लेकिन कालांतर में किसी कारण वंश पत्थर युग की वर्तमान परंपरा शुरू हो गई की इस युद्ध में चारों खामो के लोग दो भागों में बंट जाते हैं और युद्ध /खेल मैं एक व्यक्ति के खून के बराबर रक्त बहा देते हैं ,

यहां पर दो प्रसिद्ध शिलाएं रणशीला व बाराही शीला शीला है इन शिलाओं के विषय में मान्यता है कि यह शिलाएं पांडवों द्वारा फेंकी गई थी। यह दोनों ही शिलाएं बहुत ही खूबसूरत है जिसको देखने के लिए दूर-दूर से पर्यटक यहां आते हैं।

पंचेश्वर

दो प्रसिद्ध नदियां काली एवं सरयू नदी के संगम पर लोहाघाट से 40 किलोमीटर दूर यह स्थल चंपावत- नेपाल एवं चंपावत -पिथौरागढ़ की सीमा पर स्थित है। पंचेश्वर चामू या चौमुहं मंदिर वह यहां पर लगने वाले वार्षिक मेले के लिए बहुत प्रसिद्ध है। चौमुहं देवता को क्षेत्रीय पशुपालकों के रक्षक के रूप में जाना एवं पूजा जाता है यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है ।यहां पर प्रत्येक वर्ष बहुत से पर्यटक आते हैं और इस प्राकृतिक सुंदरता का आनंद उठाते हैं मंदिर के आसपास का नजारा बहुत ही रमणीक है जिससे पंचेश्वर की सुंदरता में चार चांद लगते हैं।

श्याम ताल

यह स्थल पर्यटकों के लिए एक वरदान है चंपावत से 56 किलोमीटर की दूरी पर एवं पिथौरागढ़ से 132 किलोमीटर की दूरी पर श्याम ताल हिमालय एवं प्रकृति की गोद में स्थित है इस ताल के तट पर स्वामी विवेकानंद आश्रम स्थित है यह झील नीले रंग की दिखाई देती है तथा 1.5 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली हुई है। यहां पर एक विशाल मेला झूला लगता है जो बहुत ही प्रसिद्ध है। झील के आसपास बरसात के मौसम में सुंदर नजारा दिखाई देता है। यहां पर हरी मखमली घास के सुंदर छोटे-छोटे बुग्याल है जो मन को बहुत ही आकर्षक लगते हैं।

मीठा रीठा साहिब

सिख धर्म का यह पवित्र स्थल चंपावत से 72 किलोमीटर दूर स्थित है ।यहां के विषय में मान्यता है कि इस स्थान पर स्वयं गुरु नानक ने यात्रा की थी ,तथा यहां के गोरख पंथी जोगियों के साथ विचार विमर्श विमर्श विमर्श किया था। देवरी गांव के निकट लोधिया एवं राटिया नदियों के संगम पर 1960 में इस पवित्र गुरुद्वारे का निर्माण किया गया था ।गुरुद्वारे के परिसर में मीठे-रीठे के वृक्ष है जो मंदिर के सुंदरता में चार चांद लगाते हैं इसी परिसर में नाथ पंथ के घेरनाथ का मंदिर गुरुद्वारे के साथ मिलकर बनाया गया है।

पूर्वागिरी मंदिर

समुद्र तल से 3000 मीटर की ऊंचाई पर यह स्थल स्थित है यह मंदिर टनकपुर से 20 किलोमीटर पिथौरागढ़ से 171 किलोमीटर एवं चंपावत से 92 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है यह मंदिर एक शक्तिपीठ के रूप में विख्यात है पूरे वर्ष भर देश के विभिन्न भागों से पर्यटक यहां आते रहते हैं चैत्र माह के नवरात्र के समय यहां पर एक विशाल मेले का आयोजन होता है।

पूर्वागिरी मंदिर जाने के लिए आपको 7 किलोमीटर का पैदल ट्रैक चढ़ना पड़ता है जिसमें आपको अद्भुत आनंद की प्राप्ति होती है, इसके आसपास का नजारा बहुत ही खूबसूरत एवं आकर्षक हैं भक्तगण मंदिर जाते समय माता रानी का जयघोष करते जाते हैं जिससे एक दूसरे को आगे बढ़ने में उत्साह मिलता है।

पाताल रुद्रेश्वर गुफा

इस पवित्र गुफा की खोज 1993 में एक रहस्यमय ढंग ढंग से हुई है एक 14 वर्ष के बालक को वर्ष के बालक को स्वप्न में मां दुर्गा के दर्शन हुए और इस गुफा के विषय में बताया यह गुफा चंपावत के बारसी गांव में स्थित है। जो मीठा रीठा से लगभग लगभग से लगभग 6 किलोमीटर उत्तर पूर्व में एवं देवीधुरा से 15 किलोमीटर दक्षिण में स्थित है गुफा के आसपास का नजारा बेहद खूबसूरत एवं आकर्षक है अब धीरे-धीरे या गुफा या गुफा गुफा पर्यटकों के लिए वरदान साबित हो रही है यहां पर भी पूरे वर्ष पर इस गुफा को देखने के लिए बहुत से पर्यटक आते हैं।

Leave a Comment

error: Content is protected !!