Uttarakhand aapda, Uttarakhand Glacier Burst, उत्तराखंड आपदा 2021, Full explain in Hindi

उत्तराखंड में भीषण प्राकृतिक आपदा, Uttarakhand Glacier Burst, Uttarakhand aapda, प्राकृतिक आपदा क्या होती है? परिचय, प्रबंधन, कारण व समाधान  Full explain 2021 in Hindi

7 फरवरी 2021 रविवार को सुबह उत्तराखंड के चमोली जिले के रैणी गांव (Reni Gaon) के आसपास ग्लेशियर टूटने से एक बहुत बड़ा हादसा हो गया है, जिसमें उत्तराखंड व देश को अपार जनधन की क्षति हुई है, अभी राहत एवं बचाव कार्य निरंतर जारी है। सेना, आइटीबीपी, एयर फोर्स, एसडीआरएफ, एनडीआरएफ एवं स्वास्थ्य विभाग की टीमें वहां पहुंच गई है, जिससे राहत एवं बचाव कार्य में और भी गति आई है।

खबर है कि ऋषि गंगा में जिस प्रोजेक्ट का काम चल रहा था, वहां निर्माणाधीन सुरंग में बाढ़ का पानी घुसने से कई लोगों केेे फंसे होने की आशंका है, आईटीबीपी, एनडीआरएफ और एसडीआरएफ द्वारा भारी मुश्किलों के बीच रेस्क्यू किया जा रहा है। बताया जा रहा है, कि अभी तक 200 से अधिक लोगों के हताहत होने की आशंका है, जिसमें एनटीपीसी के निर्माणाधीन हाइड्रो प्रोजेक्ट के इंजीनियर, मजदूर एवं अन्य स्टाफ के लापता होने की सूचना है।

घटनास्थल पर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री श्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने तत्काल दौरा किया और वहां पर हालात का जायजा लिया और अधिकारियों एवं चमोली प्रशासन को आवश्यक दिशा निर्देश भी दिए उत्तराखंड सरकार ने मृतकों के परिजनों को ₹6 लाख देने की घोषणा की है।

जिसमें ₹ 4 लाख राज्य सरकार और ₹2 लाख का केंद्र सरकार सहयोग करेगी, Uttarakhand aapda की इस घटना पर देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी एवं गृह मंत्री श्री अमित शाह जी लगातार उत्तराखंड सरकार के संपर्क मैं हैं, और पूरे घटनाक्रम पर पैनी दृष्टि बनाए हुए हैं, इस भीषण आपदा में कई देशों के नेताओं ने दुख की घड़ी में अपनी संवेदना व्यक्त की है, और उत्तराखंड को हर संभव मदद करने की बात कही है।

इस आपदा ने 2013 की केदारनाथ आपदा की स्मृति को ताजा कर दिया है, केदारनाथ में भी जून 2013 में इसी प्रकार का ग्लेशियर टूट गया था, जिसमें भी उत्तराखंड और देश को भारी जान माल की क्षति हुई थी, जिसका  पुनर्निर्माण कार्य अभी भी जारी है, चमोली जिले की इस आपदा हेतु जिला प्रशासन द्वारा Toll free number 1070 एवं 9557444486 जारी किए हैं, इन नंबरों पर आप जरुरी सूचना प्राप्त कर सकते हैं।

ग्लेशियर की टूटने की सूचना मिलते ही प्रशासन द्वारा हरिद्वार तक गंगा को अलर्ट पर रखा गया है, और गंगा किनारे से लोगों को दूसरी जगह शिफ्ट कर दिया गया हैं, जिससे यदि नदी का जलस्तर बढ़ता है, तो कोई अप्रिय घटना ना हो। गढ़वाल क्षेत्र में सदियों से इस प्रकार की आपदाएं आती रहती है, जिससे बड़े पैमाने पर नुकसान होता है।

आज कई वर्षों बाद रैणी गांव फिर से Uttarakhand aapda की वजह चर्चा में आ गया है। यह वही गांव है जहां पर गौरा देवी ने अपनी सहेलियों के साथ पेड़ों पर लिपटकर पर्यावरण को बचाने की मुहिम चिपको आंदोलन (Chipako Andolan) के नाम से शुरू की थी, अब ग्लेश्यर टूटने की खबर भी इसी गांव की है, कारणों का पता वैज्ञानिक लगा रहे हैं। आज हमारे द्वारा प्रकृति के साथ अत्यधिक छेड़छाड़ करने से भी इस प्रकार की घटना को बल मिला हो, चिपको आंदोलन पूरे देश और दुनिया में तत्कालीन समय में प्रसिद्ध हो गया था।

प्राकृतिक आपदा क्या है ?  प्राकृतिक आपदा का परिचय, वर्गीकरण, प्रबंधन, एवं कारण व समाधान

1-आपदा का परिचय             2 वर्गीकरण

3 आपदा प्रबंधन                  4 कारण एवं समाधान

आपदा का परिचय

खतरे का  ऐसा स्वरूप जिससे विशाल स्तर पर जन-धन वह भूमि की हानि होती है, उसे आपदा कहते हैं। उत्तराखंड में विशिष्ट भौगोलिक संरचना के कारण प्रतिवर्ष प्राकृतिक एवं मानव जनित आपदा का सामना करना पड़ता है। प्राकृतिक आपदाओं को रोक पाना बहुत ही मुश्किल कार्य है, फिर भी आपदा से पूर्व यदि हम सतर्क रहें, तो काफी हद तक सुरक्षित रह सकते हैं ।यदि हमें आपदा के विषय में जानकारी है, तो आपदा के बाद जो खतरे उत्पन्न होते हैं उनसे हम सुरक्षित रह सकते हैं ।

इसलिए आज के समय में हमें आपदा की जानकारी रखना नितांत आवश्यक है, जिससे बड़े नुकसान से कुछ हद तक राहत मिल सके कुछ आपदा प्राकृतिक होती है लेकिन कुछ आपदाएं मानव जनित भी होती इसलिए हमें आपदा के विषय में जानकारी होना अति आवश्यक है। प्राकृतिक आपदाओं में भूकंप एवं ग्लेशियरों का टूटना बहुत  खतरनाक होता है। आपदा को मुख्य रूप से दो भागों में विभाजित किया जाता है ।

1- प्राकृतिक आपदा                        2 मानव जनित आपदा

प्राकृतिक आपदा

ऐसी आपदा जिसमें मानव का किसी भी प्रकार का वश नहीं चलता। प्राकृतिक आपदा एक प्राकृतिक जोखिम है, प्राकृतिक आपदाओं में भूकंप ज्वालामुखी विस्फोट बाढ़ आना  हिम खंडों का टूटना अतिवृष्टि इत्यादि है। इन सभी प्रकार की आपदाओं में अपार जन धन की हानि बड़े पैमाने पर होती है, इन सभी आपदाओं से मनुष्य तथा पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है ।

प्राकृतिक आपदा भी कुछ भूमि से चालन होती है जैसे- भूकंप, भूस्खलन एवं मिट्टी का बहाव ज्वालामुखी विस्फोट एवं कुछ आपदाएं जलीय आपदा भी होती है, जिनमें बाढ़, सुनामी या मौसमी आपदाएं भी शामिल है, जिसमें बर्फीली हवाएं एवं सूखा मुख्य है।

मानव जनित आपदा।

ऐसी आपदा जो प्रकृति द्वारा उत्पन्न नहीं होती है बल्कि मानव स्वयं इसका जिम्मेदार होता है उसे मानव जनित आपदा कहते हैं। मानव जनित आपदा के भी कई प्रकार है जिसमें बड़े बड़े उद्योगों में आग लगना जंगलों में आग लगना आतंकवादी घटनाएं वह मानव निर्मित बीमारियां जैसे हाल ही में कोरोना बीमारी ने सभी को दहशत में डाल दिया था यह भी एक प्रकार की आपदा थी यह सभी प्रकार की आपदायें मानव जनित आपदा है।

इसमें यदि थोड़ी बहुत भी सावधानी रख ली तो बहुत बड़ी खतरे से बचा जा सकता है। इसलिए हम जिस जगह पर भी काम करते हैं हर समय पेनी दृष्टि जरूर रखनी चाहिए।

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विभिन्न प्रकार की आपदाओं की  व्याख्या

अतिवृष्टि

बारिश के समय जब किसी क्षेत्र विशेष में अचानक तेज बारिश होती है, जिससे बादल फटने एवं भूस्खलन जैसी घटनाओं का जन्म होता है, उसे हम सामान्य तौर पर अतिवृष्टि कहते हैं ।

हिम खंडों का गिरना ।

ऊंचाई वाले क्षेत्रों में जहां बर्फबारी बहुत ज्यादा होती है, ऐसे स्थानों पर शीतकालीन समय में बर्फ के बड़े-बड़े पहाड़ों के गिरने की घटनाएं होती है, जिससे वहां व्यापक स्तर पर जान-माल की हानि होती है, जिसका ताजा उदाहरण अभी उत्तराखंड चमोली जनपद की जोशीमठ के आसपास रेणी नामक गांव की घटना है। यहां पर भी अपार धन-धन की हानि हुई है।

भूकंप

भूकंप भूमि के अंदर की कंपन है, जिसकी लहरों द्वारा धरती कांप उठती है। भूकंप की उत्पत्ति भूमि के अंदर भू-गर्भीय प्लेटो की इधर-उधर खिसकने, टकराने एवं ज्वालामुखी विस्फोट होने से वह बड़ी-बड़ी बांध परियोजनाओं के निर्माण व उनके टूट जाने से भी भूकंप का खतरा बना रहता है। भू-वैज्ञानिकों के अनुसार हिमालय क्षेत्र उत्तराखंड में भूकंप अधिकतर प्लेटो की गतिशीलता के कारण आते हैं।

बाढ़

अत्यधिक वर्षा होने की कारण जब नदी नालों का जल स्तर बढ़ जाता है, इस जल स्तर से अपार जनधन की हानि की संभावना रहती है, उसे बाढ़ कहते हैं।

आपदा प्रबंधन

प्राकृतिक आपदा से निपटने के लिए उत्तराखंड पूरे राज्य के लिए आपदा प्रबंधन एवं न्यूनीकरण केंद्र (DMMA) राज्य आपदा प्रतिक्रिया निधि का गठन किया गया है, इन सभी प्रकार केन बंधन में इस क्षेत्र के विशेषज्ञों को शामिल किया जाता हैै। राज्य मैं जो भी आपदाएं आती है, इनकी जागरूकता के लिए यह अनेक कार्यक्रम संचालित करते हैं। जिससे लोगों में आपदा के प्रति जागरूकता फैल जाए, इसीलिए आपदा प्रबंधन विभाग का गठन सरकार द्वारा किया गया है।

आपदा के कारण

आपदा आने के पीछे मनुष्य ही का हाथ होता है। जब मनुष्य प्रकृति के साथ छेड़छाड़ करता है, या प्रकृति का अत्यधिक दोहन करता है, तो प्रकृति पर अत्यधिक भार होने के कारण या संतुलित करने के लिए आपदा जैसी घटनाएं होती हैं।

अवैध खनन

नदी के किनारों पर रेत बजरी पत्थर की अत्यधिक मांग होने के कारण नदियों में अवैध खनन का कारोबार चरम पर है, जिससे भूस्खलन की की संभावनाएं अत्यधिक बढ़ जाती है।

बढ़ती जनसंख्या

पूरे देश में जनसंख्या निरंतर तीव्र गति से बढ़ रही है, इतनी बड़ी जनसंख्या को सड़क, घर या अन्य प्रकार की सुख-सुविधाओं हेतु प्रकृति का दोहन करना पड़ता है, जिससे आपदा आने की संभावना और बढ़ जाती हैं।

जंगलो का अवैध कटान

उत्तराखंड प्रदेश पहाड़िया मैदानी भागों में वृक्षों का अंधाधुंध कटान हो रहा है ।सभी प्रकार की पेड़ों का अवैध कटान हो रहा है जो प्रकृति के लियाज से बहुत ही खतरनाक है और यह छोटी-छोटी घटनाएं भविष्य में विभिन्न प्रकार की आपदाओं का कारण बन सकती है।

बड़े-बड़े बांधों का निर्माण

उत्तराखंड में कहीं नदियों पर बड़े-बड़े बांधों का निर्माण हो चुका है, और कहीं पर यह कार्य निर्माणाधीन है, जो भविष्य में भूस्खलन एवं बाढ़ जैसी घटनाओं को जन्म दे सकते हैं।

समाधान

पहाड़ी क्षेत्र की प्रमुख विशेषता अत्यधिक मात्रा में वन संसाधन का होना है। यदि इन वनों को काटे बिना विकास के कार्य किए जाते हैं, तो आपदा में काफी हद तक कमी आ सकती है। हिमालयी क्षेत्रों में जल की अधिकता के कारण निजी व सरकारी कंपनियों की तरफ से जल विद्युत परियोजनाओं की बाढ़ सी आ गई है, बड़े पैमाने पर पहाड़ों को तोड़ा जाता है, जिसमें कई प्रकार के विस्फोटकों का भी प्रयोग होता है, बड़े धमाकों से हिमालय की कच्ची पहाड़ियां हिल जाती हैं, जिससे आपदा आने का खतरा और अधिक बढ़ जाता है।

इस प्रकार की योजनाओं के लिए पुनः समीक्षा करने की आवश्यकता है । जिससे पहाड़ों एवं वहां की वनस्पति के लिए किसी भी प्रकार का नुकसान ना हो जिससे आपदा में कमी आ सकती है।

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